दशहरा - 2025

आज (2 अक्टूबर) दशहरा है। माना जाता है कि त्रेतायुग में श्रीराम ने आश्विन शुक्ल दशमी तिथि पर रावण का वध किया था। ये धर्म की जीत का पर्व है। रावण को कुल से ब्राह्मण माना जाता है, लेकिन उसके कर्म राक्षसों जैसे थे, इसी वजह से आज भी रावण के पुतले जलाए जाते हैं।

रावण के जन्म से वध तक की कहानी

Source - www.bhaskar.com

दशहरा (विजयदशमी): एक विस्तृत अवलोकन


CGPSC और CGVYAPAM परीक्षाओं के लिए सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संदर्भ

दशहरा, जिसे विजयदशमी भी कहा जाता है, भारत के प्रमुख त्योहारों में से एक है. यह बुराई पर अच्छाई की जीत, असत्य पर सत्य की विजय और अधर्म पर धर्म की स्थापना का प्रतीक है. यह त्योहार विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग तरीकों से मनाया जाता है, लेकिन इसका मूल संदेश एक ही है.

  • दशहरा का अर्थ और महत्व:

    • दशहरा: 'दश' (दस) और 'हरा' (हार जाना) से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है दस बुराइयों का हार जाना. यह रावण के दस सिरों का प्रतीक है, जो दस बुराइयों (काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, अहंकार, आलस्य, हिंसा, चोरी) का प्रतिनिधित्व करते हैं.

    • विजयदशमी: 'विजय' (जीत) और 'दशमी' (दसवीं तिथि) से बना है, जिसका अर्थ है जीत की दसवीं तिथि.

    • महत्व: यह त्योहार धर्म, न्याय और सच्चाई के मूल्यों को स्थापित करने का संदेश देता है. यह लोगों को आंतरिक बुराइयों को त्यागने और सदाचार का मार्ग अपनाने के लिए प्रेरित करता है.

  • पौराणिक कथाएं और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:

    • भगवान राम की विजय:

      • सबसे प्रचलित कथा के अनुसार, इस दिन भगवान राम ने लंकापति रावण का वध कर सीता माता को वापस प्राप्त किया था. यह युद्ध लगातार 10 दिनों तक चला था, और दसवें दिन राम ने रावण का अंत किया. यह कथा रामायण में वर्णित है.

      • रावण दहन: इस दिन रावण, मेघनाद और कुंभकरण के पुतले जलाए जाते हैं, जो बुराई के विनाश का प्रतीक है.

    • देवी दुर्गा की महिषासुर पर विजय:

      • यह त्योहार नवरात्रि के नौ दिनों के बाद आता है, जिसमें देवी दुर्गा ने महिषासुर नामक राक्षस का वध किया था. दसवें दिन (विजयदशमी) देवी ने महिषासुर का संहार कर धर्म की स्थापना की थी.

      • शक्ति पूजा: बंगाल, ओडिशा और असम जैसे पूर्वी राज्यों में यह दुर्गा पूजा के रूप में मनाया जाता है, जहां देवी दुर्गा की नौ दिनों तक पूजा की जाती है और विजयदशमी के दिन उनकी प्रतिमाओं का विसर्जन किया जाता है.

    • अन्य मान्यताएं:

      • कुल्लू दशहरा: हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में इसे 'ढालपुर मैदान' में रघुनाथ जी की रथ यात्रा के रूप में मनाया जाता है, जो 7 दिनों तक चलती है.

      • मैसूर दशहरा: कर्नाटक के मैसूर में यह 'नाद हब्बा' (राज्य उत्सव) के रूप में मनाया जाता है, जिसमें देवी चामुंडेश्वरी की पूजा की जाती है, जिन्होंने महिषासुर का वध किया था. भव्य जुलूस और रोशनी इसकी विशेषता है.

      • शस्त्र पूजा: योद्धा इस दिन अपने हथियारों की पूजा करते हैं, जो बुराई से लड़ने की शक्ति का प्रतीक है.

  • दशहरा से जुड़े अनुष्ठान और परंपराएं:

    • रावण दहन: शाम को खुले मैदानों में रावण, मेघनाद और कुंभकरण के विशाल पुतले जलाए जाते हैं, साथ ही आतिशबाजी भी की जाती है.

    • रामलीला: नवरात्रि के दिनों में और दशहरा से पहले रामलीला का मंचन किया जाता है, जिसमें भगवान राम के जीवन की घटनाओं का नाटकीय रूपांतरण किया जाता है.

    • शस्त्र पूजा: क्षत्रिय समुदाय और सेना के जवान इस दिन अपने शस्त्रों और औजारों की पूजा करते हैं.

    • देवी विसर्जन: पूर्वी भारत में दुर्गा पूजा के समापन पर देवी दुर्गा की मूर्तियों का जल में विसर्जन किया जाता है.

    • रावण संहिता का पाठ: कुछ स्थानों पर रावण संहिता का पाठ भी किया जाता है, जिसमें रावण के ज्ञान और गुणों का उल्लेख होता है.

    • शुभ कार्य: इस दिन को नए व्यापार शुरू करने, वाहन खरीदने या अन्य शुभ कार्य करने के लिए बहुत शुभ माना जाता है.

  • दशहरा का सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व:

    • पारिवारिक मिलन: यह त्योहार परिवारों को एक साथ लाने और संबंधों को मजबूत करने का अवसर प्रदान करता है.

    • सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण: रामलीला और अन्य लोक कलाओं के माध्यम से सांस्कृतिक परंपराओं को जीवित रखा जाता है.

    • एकता और सद्भाव: विभिन्न समुदायों के लोग इस त्योहार को एक साथ मनाते हैं, जिससे सामाजिक सद्भाव बढ़ता है.

    • नैतिक शिक्षा: यह बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश देकर नैतिक मूल्यों को बढ़ावा देता है.

  • दशहरा और छत्तीसगढ़:

    • बस्तर दशहरा: छत्तीसगढ़ का बस्तर दशहरा विश्व प्रसिद्ध है और यह अपने आप में अद्वितीय है. यह भगवान राम की विजय के बजाय स्थानीय देवी दंतेश्वरी (बस्तर की अधिष्ठात्री देवी) को समर्पित है.

    • अवधि: यह 75 दिनों तक चलता है, जो श्रावण अमावस्या से शुरू होकर अश्विन शुक्ल त्रयोदशी (विजयदशमी के कुछ दिन बाद) तक चलता है.

    • प्रमुख अनुष्ठान: इसमें 'काछिन गादी' (देवी से अनुमति लेना), 'जोगी बिठाई' (जोगी को नौ दिनों तक तपस्या के लिए बैठाना), 'रथ परिक्रमा' (भव्य लकड़ी के रथों की खींचाई), और 'मुड़िया दरबार' (ऐतिहासिक दरबार) जैसे अद्वितीय अनुष्ठान शामिल हैं.

    • महत्व: यह बस्तर की आदिवासी संस्कृति, परंपराओं और ऐतिहासिक विरासत का एक जीवंत प्रतीक है, जो CGPSC और CGVYAPAM के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है.